कर्कराशि का स्वामी ग्रह,दिशा ( कार्य करने की ) राशि का तत्व, कर्कराशि का स्वभाव, कर्कराशि के नक्षत्र
इस राशि के जातक सुन्दर, स्थूल एवं पुष्ट शरीर, गौर अथवा पाण्डुवर्ण, चौड़ा चेहरा, चौड़ा मस्तक, मध्यम कद. विशाल नेत्र, शीघ्र चलने वाले, अत्यधिक बोलने वाले तथा कुशाग्रबुद्धि होते हैं। इनकी स्त्री तो पतिव्रता होती है, किन्तु ये परस्त्रियों में आसक्त रहते हैं। इनकी अनेक संतानों में योग्य केवल एक निकलती है।
कर्कराशि से संबन्धित तथ्य
कर्कराशि का स्वामी ग्रह
कर्कराशि का स्वामीग्रह “चन्द्र ”ग्रह होता है
दिशा (कार्य करने की)
उत्तर दिशा है
प्रत्येक राशि किसी ना किसी तत्व से सबंधित होती है
कर्कराशि :जल तत्व की राशि है
स्वभाव :-
कर्कराशि का स्वभाव चार है वह अपने से जातक को प्रभावित करती है |
नक्षत्र :-
नक्षत्रो का जातक पर प्रभाव :-
1.पुनर्वसु :- स्वामी गुरु धनी, सुंदर,पुण्यवान ,दानी
2॰पुष्य :- धार्मिक,शांत, प्रसन्न, स्वस्थ
3. आश्लेषा :- भ्रमणशील, क्रोधी, व्यसनी
अतः कर्कराशि मे जन्मे जातक पर तीन ग्रहो और तीनों नक्षत्रो का जातक की कुण्डली के अनुसार ,महादशा ,अंर्तदशा , प्रव्यंतरदश, योगिनीदशा का प्रभाव पड़ता है|
पुनर्वसु नक्षत्र का प्रभाव :-
पुनर्वसु - विचारपूर्वक कार्य करने वाली, शिक्षक, मधावी, दे रोग-पीड़ित, ससुराल से धन प्राप्त करने वाला, वृद्धावस्था सुखी, स्वच्छ वस्त्रों का इच्छुक, क्रोधी, अभिमानी, उच्चाधिका उत्तम तथा महत्वपूर्ण पद प्राप्त करने वाला व्यभिचारी, आलसी तथा हाथ-पैरों की पीड़ा से ग्रस्त ।
पुष्य नक्षत्र का प्रभाव :-
पुष्य - अस्वस्थ, चतुरतापूर्वक कार्यों को निबटाने वाला, शिवभक मशीनरी वस्तुओं से लाभ पाने वाला, मित्रों से विरोध करने वाला व्यापारिक बुद्धिवाला, सम्बन्धियों से प्रेम-भाव रखने वाला मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त, साधारण आर्थिक स्थितिवाला तथा स्पष्ट वादी ।
आश्लेषा नक्षत्र का प्रभाव :-
आश्लेषा-वृद्धावस्था में सुखी, स्वच्छ वस्त्रों का इच्छुक, क्रोधी, अभिमानी, उच्चाधिकारी, उत्तम तथा महत्वपूर्ण पद प्राप्त करने वाला व्यभिचारी, आलसी तथा हाथ-पैरों की गणना से गरत ।
कर्कराशि के फल
इस राशि के जातक सुन्दर, स्थूल एवं पुष्ट शरीर, गौर अथवा पाण्डुवर्ण, चौड़ा चेहरा, चौड़ा मस्तक, मध्यम कद. विशाल नेत्र, शीघ्र चलने वाले, अत्यधिक बोलने वाले तथा कुशाग्रबुद्धि होते हैं। इनकी स्त्री तो पतिव्रता होती है, किन्तु ये परस्त्रियों में आसक्त रहते हैं। इनकी अनेक संतानों में योग्य केवल एक निकलती है।।
इस राशि के जातक ऐश्वर्यशाली, आत्मविश्वासी, ईमानदार सुवक्ता, गृहासक्त, न्यायप्रिय, योजनाप्रिय, व्यसनी, असफल प्रेमी अत्यंत बुद्धिमान, शूरवीर, क्रोधी, कर्मठ, शास्त्रज्ञ, धनी, अधिकारी, दयालु गुरुजनों के प्रिय, स्त्री-प्रेमी, माता-पिता तथा साधु-संतों के भक्त, मित्रों को प्रिय, नवीन योजनाओं से लाभ उठाने वाले, घर-गृहस्थी के कार्यों से दूर रहने वाले, जलक्रीड़ा तथा सुगंधित वस्तुओं के प्रेमी, माता, गृह, भूमि तथा वाहन आदि का सुख प्राप्त करने वाले, किसी एक मित्र के द्वारा परित्यक्त, राज्य द्वारा कष्ट पाने वाले, अपने पुरुषार्थ द्वारा व्यवसाय तथा वंश की उन्नति करने वाले, काव्य, संगीत, ज्योतिष, गणित तथा चित्रकारी के प्रेमी होते हैं। ये जल से सम्बन्धित कार्यों अथवा नौकरी द्वारा जीविका चलाने वाले होते हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र में जन्मे जातक, क्रोधी, परंतु विद्वान, पुष्य नक्षत्र का तपस्वी, सहनशील तथा आश्लेषा का आलसी शोक, मोह से ग्रस्त एवं हिंसक होते हैं।
इनके जीवन के पहले वर्ष में रोग, तीसरे में गुप्तांग पीड़ा, इकत्तीसवें में सर्पभय तथा बत्तीसवें में रोगभय बना रहता है। इनका शुभ दिन रवि, सोम तथा बुध होता है और शेष दिन सामान्य होते हैं। मिथुन, कर्क, सिंह तथा कन्या राशि वाले व्यक्ति के साथ इनकी मैत्री, विवाह अथवा व्यावसायिक सम्बन्ध सुखप्रद होता है।